अंजामे गुलिस्ताँ क्या हो गा ??? @ ✒गुरू बलवंत गुरुने⚔

अंजामे गुलिस्ताँ क्या हो गा ??? @ ✒गुरू बलवंत गुरुने⚔

© राजनीती की शतरंज पे गुजरात और हिमाचल का पासा फेंका जा चुका है। मौका परस्त  लोग अपनी राजनितिक रोटियाँ सेकने में लगे हैं। उन्हें विशवास है, एक दृढ़ विश्वास,  कि व्यवस्था पे शायद सत्ताधारी इतने काबिज़ हो चुके हैं, कि अब वह कुछ भी कर गुज़रने से गुरेज़ न करें गे, और जीत उन्ही के नाम दर्ज हो गी।

दूसरी ओर लोकतन्त्र के हिमायती, इस उम्मीद पे बैठे हैं की नहीं, शायद इतनी बड़ी धांदली सम्भव नहीं।
और  देश के ज्यादा तर लोग उन भेड़ों की तरहं हो गये हैं, जो भेड़ियों से घिर गई हों। सिवाय ममियाने के शायद कोई कुछ जानता ही नहीं, बस बेबस और मजबूर ममियाहट सी सुनने में आ रही है, जो गुस्से में तब्दील भी हो सकती है, यदी वह सभी नेता, जो अपनी अपनी खाल बचाने में लगे हैं, अपनी खुदगर्ज़ी और अपनी कायरता से उभर कर सामने आएं।

अब मामला धैर्य से हट कर हिम्मत और शौर्य पे आन पड़ा है, क्यों की सत्य के लिये खड़े होना तो दूर, सत्य के पक्ष में बोलने वाले भी मुहाल होते जा रहे हैं।  तो ऐसे में सरकट नेता ही सामने आ कर कुछ करें तो करें, बिकाऊ या तो बिक गए, या बिकने को तैयार बैठे हैं।

ऐसा क्यों है। यह जानने के लिये मैंने, पतलून और टाई कस के  कुछ सोशल क्लब्स का जायज़ा लिया, और साथ ही अपने मैले कुचैले भेस में कुछ सड़कों पर भी घूमा,  कुछ बुद्धिजीवियों से भी मिला और कुछ आम कामकाजी लोगों से भी, साथ ही बाजार पे भी नज़र मारी।

निष्कर्ष यह निकला,
1.  ज्यादा तर लोग निराश हैं। वह कह रहे हैं की लुटती तो मतदान पेटियां भी थी, लेकिन अब तो लगता है पूरा का पूरा मतदान ही लूटा जा रहा है, और अगर  एक्सिट पोल जो कह रहा है वह सत्य हुआ, तो हाथ चन्दन को आरसी क्या, यह कथन सिद्ध हो जाये गा।

2. विपक्ष यदी इतना कमज़ोर पड़ गया, या कर दिया गया, कि उस के हाथ से जीती हुई बाज़ी भी सत्ता पक्ष ले उड़े, तो समझ लीजिए की उस के पास सड़कों पे उतरने के इलावा और कोई चारा नहीं रह जाए गा। और यदी ऐसा करने में विपक्ष विफ़ल हुआ, यानी कृष की नगरी गुजरात में हुए लोकतन्त्र नामी द्रौपदी के चीर हरण के बाद भी कुल मिला कर देश के लोकतन्त्र के पल्ले बनवास ही पड़ा, तो देशवासियों को महाभारत करना ही हो गा, अन्यथा, विपक्ष नहीं, बल्कि लोकतन्त्र ही एक लम्बे बनवास पे चला जाये गा।

3. बाज़ार की कहें तो, वह लुढ़कने की तैयारी में है। खास तौर पे नेपाल में जो हुआ, वह एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पे चीन के हाथोँ भारत की हुई कूटनीतिक हार है। मुद्रा बाजार के साँढ़ दावा कर रहे हैं की हम सब कुछ सींगों पे उठा लें गे, कोई फ़िक्र नहीं,  लेकिन तमाम भालू, अपने सामान को यूं समेटने की तय्यारी  में लगे हैं जैसे की किसी हमलावर के बड़े आक्रमण से पहले, व्यपारी लोग शहर छोड़ कर जाने से पहले करते हैं।

4. कुछ पढ़े लिखे मौका परस्त लोग, कुछ अफ़सर शाही से जुड़े लोग और कुछ धर्म भ्रांत लोग, अभी भी अपने आप को सत्तापक्ष के पक्षधर बन कर इस तरहं पेश आ रहे है, जैसे कि उन की मन की मुराद पूरी हुई हो, और वह यही चाहते हों जो होने जा रहा है, या जिस के होने की उम्मीद जताई जा रही है।  लेकिन अंदर ही अंदर सब की बोलती बन्द है, क्यों की लोकतन्त्र में किसी भी दल का इतना बड़ा बर्चस्व, कभी भी आम जन्ता की राय से बन ही नहीँ सकता। सभी कहते हैं की यदि एक्सिटपोल के नतीजे सही निकले तो समझो दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि दाल ही काली है।

5.  मेरा निष्कर्ष यह है की यदि गुजरात में एक ज़बरदस्त एंटी एंटीइनकम्बेंसी-वेव के बावजूद, भाजपा जीत जाती है, तो समझ लीजिये, की उस के बाद सत्ता का जो नंगा नाच खेला जाये गा, वह अद्वित्य हो गा। देश में यदी गुजरात जैसे माहौल में भी सत्तापक्ष जीत जाता है, तो अवश्य ही इस के दूरगामी परिणाम दुर्भाग्य पूर्ण  हों गे।

6 .  मैं यह भी दावे के साथ कह रहा हूँ कि इस सब रेलमपेल  का कारण भारतीयता  का लुप्त होता हुआ पौधा ही है। आलम यह है कि भारत से भारतीय तो गायब हैं, हिन्दू सिक्ख और मुसलमान हर जगह, हाज़िर हैं।  जाट, सैनी, पटेल, राजपूत, दलित वगैरा वगैरा जगह जगह दिख रहे हैं, लेकिन भारतीय नदारद है।

7. यह भी की सभी, बुद्धिजीवी, अफ़सर, ब्यूरोक्रेट्स, और जिस का बस चले वह, इनाम और कुर्सी बटोरने में लगे हैं। कभी कॉंग्रेसी चमचों द्वारा पकड़ी गयी कुर्सियों पर, अब भाजपाई चमचों में बैठने की  होड़ है। यानी मारम- मार का आलम है। कुछ लोग बस अपनी तनख्वाह बढ़ाने में या फिर गोल्फ या ताश के पत्ते या फ़िर 'I am better than you' का खेल भर खेल कर अपने आप को भूरे अँगरेज़ बनाने की होड़ में लगें हैं।
प्रोफेसर HOD और VC बनने की जंग में व्यस्त हैं, मास्टर हेडमास्टर बनने की दौड़ में हैं, पटवारी नायब तहसीलदार बनने की होड़ में हैं,  तहसीलदार IAS बनने की होड़ में हैं, और IAS और भी मलाईदार कबाब पाने और खाने की होड़ में लगे हुए  हैं। किसान हैं कि  मर रहे हैं, फ़ौजी नाखुश हैं, विद्यार्थी अपनी कक्षा में बैठे अध्यापकों का इंतज़ार कर रहे हैं,  और अध्यापक हर एक दो महीने बाद या तो एलक्शन ड्यूटी कर रहे हैं,  और या फिर खुले में संडास कर रहे लोगों को ऐसा न करने का सबक पढ़ाने में लगे हैं।

8.  इस सब के चलते लुटेरे व्यपारिक घराने, जन्ता की जेब कतरने में लगे हैं, और नेता लोग किसी भी कीमत पर कुर्सी पे जमे रहने की कवायद में व्यस्त हैं।
मेरे निष्कर्ष कड़वे हैं, लेकिन ऐसा इस लिए है, क्यों की मैं किसी भी एक दल का पक्षधर नहीँ हूँ, केवल भारतीयता का पक्षधर हूँ।  और भारतीयता, शुद्ध लोकतन्त्रिक सोच से उपजा पौधा है, जिस की रक्षा किसी भी कीमत पे करना अनिवार्य है।

आज जहाँ बात आन पहुंची है, तो बस श्री गोपाल कृष्ण भट्ट, 'आकुल' की इन पंक्तियों को दोहराना पड़े गा...
"कांड हादसों घोटालों से,फ़ि‍क्‍िंसग और हवालों से।
लि‍खे जा रहे सफ़्हे ग़दर के बाद अनेकों सालों से।
जब से लोकशाही के घि‍नौने, रूप सामने आने लगे।
क्‍या उम्‍मीद करें जस्‍टि‍स की जहां जस्‍टि‍स ही आँसू बहाने लगे।
तू भूल गुज़श्‍ता भारत को,  अब कोई करि‍श्‍मा क्‍या होगा?
हर शाख पे उल्‍लू बैठा है, अंजामे गुलिस्ताँ क्या हो गा।।

🚩सत्य मेव जयते, तत्त सत्त श्री अकाल🚩
© ✒ गुरू बलवंत गुरुने ⚔

मंगोलों और ख़िलजी में सम्बन्ध @ ✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

कौन थे मंगोल, क्या था मंगोलों और ख़िलजी में सम्बन्ध@ ✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

©मंगोल, एक ऐसा नाम, जिस से किसी ज़माने में, क्या राजा और क्या आम जन, ऐसे घबराते थे जैसे की किसी प्लेग की बीमारी से, या किसान किसी टिड्डी दल के आक्रमण से घबराते हैं।

आख़िर ऐसा क्या था मंगोलों में।  सच्च कहूँ तो तीन चीज़ें थी, एक रफ़्तार, दूसरा ह्रदय व्हीनता, और तीसरा किसी ज़मीन पर काबिज़ होने की लालसा की जगह केवल लूट की भयंकर पिपासा।

यह कबाइली घुड़सवार योद्धा बड़ी रफ़्तार से अपने निश्चित निशाने पर हमला बोलते, जो भी लूटना चाहते लूट लेते, और उपरांत उस के बहुत निर्दयता से सभी बकाया जीवित इंसानों को, बच्चों को, बूढ़ों को, बीमारों को, यहां तक की कुत्ते बिल्लियों तक को भी मौत के घाट उतार देते।

इन की निर्ममता इतने पर ही समाप्त न होती, बल्कि यह सभी पुस्तकालयों, धर्म स्थलों और गोदामों को, महलों और घरों को, झोंपड़ियों और खेतों को आग लगा देते, और आलम यह होता की कम से कम एक सदी तक निर्दयी मंगोलों की विनाश लीला के निशान, इन द्वारा बर्बाद किये हुए स्थानों पर दिखते रहते।

मैं यहाँ ही स्पष्ट कर दूँ की माँगोलों को मुसलमान कहना या समझना एक बहुत बड़ी गलती है। इन का इस्लाम से पहले पहल दूर दूर का भी सम्बन्ध नहीं था।
यह लोग कुछ-कुछ बुद्ध धर्म, कुदरत परस्ती, रूह परस्ती और कबाइली धर्म और टेंगरिज़्म के अनुयायी थे। 

ख़ान शब्द इन के साथ इस लिए नहीं जुड़ा की यह मुसलमान थे बल्कि ख़ान का मतलब होता है राजा, और खन्नात किसी खान के राज्य को कहते हैं।
यह अलग बात है की बाद में मंगोलों ने इस्लाम धर्म से प्रेरित हो कर इस का अनुग्रह कर लिया, लेकिन याद रहे, कि 1200 के दशकों में  बग़दाद की सल्तनत, और बाकी इस्लामिक इलाकों को पूरी तरहं बर्बाद करने वाले मंगोल ही थे।

यहां तक की इस्लामी सभ्यता के सुनहरे युग का अंत मंगोल तीरों और तलवारों और इन ही की घोड़ों की टापों ने किया।

आइये अब मंगोल वंश के बारे कुछ जान लें।
मंगोल कबीले तो पहले से ही कायम थे, लेकिन मंगोल राज्यवंश की स्थापना 1206 में तब हुई, जब मंगोल कबीलों के कई सरदारों ने 44 वर्षीय तैमूजिन को अपना मुख्य मुखिया चुना, और उसे चंगेज़ ख़ान की उपाधी दे दी।

चगेज़ का अर्थ है, महान बलशाली बलवन्त, और ख़ान का अर्थ है राजा।  तेमुजिन अब मंगोलों का महान बलशाली राजा घोषित हो गया।

भारतीय उप महादीप और  परसिया, चीन, रूस, सभी को इन्होंने  निशाने पे लिया, और किसी भी धार्मिक भेद भाव के बिना, या मज़ाक में कहें तो एकदम सेकुलर दृष्टि से जिधर भी देखा, लूट और तबाही मचा दी।

यानी मंगोल किसी पर धार्मिक भावनाओं को मुख्य रख कर नहीं, बल्कि इक विशाल लूट को मुख्य रखते हुए आक्रमण करते थे। इन्हें आप मेगा-लुटेरे कह सकते हैं, जो घरों को नहीं, बल्कि पूरे के पूरे शहरों और राज्यों को लूटा करते थे, जैसे की आज के कुछ मल्टी नेशनलनल व्यपारी।

विजय माल्या नवयुग के मंगोलों की एक अच्छी उदाहरण है, जो 9000 करोड़ ₹ की लूट कर के लन्दन में बैठा है, जब की भारत सरकार हाथ पे हाथ धरे बैठी है। अडानी अम्बानी भी आज के मंगोल हैं, जो लाखों करोड़ों रूपये का लोन ले कर सरकार द्वारा माफ़ करवा लेते हैं।

चलिये बात को फ़िर मंगोलों की तरफ़ ले जाएँ।
चगेज़ खान के मंगोल ख़ानेह-खानाह बनने के बाद मंगोलों ने बड़े स्तर पे अपनी जंगी करवाई बढ़ा दी।

मंगोलों की नीती स्पष्ट थी, वह किसी भी राज्य पे हमला करने से पहले उसे घेर लेते, और एक भारी हरजानां माँगते। इस हरजानें में शामिल होते, फ़ौज में भर्ती करने के लिए सेहतमंद युवा, हरम के लिए खूबसूरत स्त्रियां, हीरे मोती, सोना चांदी, हथियार, बर्तन, बहुत सा धन व घोड़े। यदि कोई शाशक यह सब पेश कर देता, तो मंगोल अगली मंजिल का रुख करते, अन्यथा उस शहर या राज्य का नामों निशान ही मिटा देते।

हालां की चंगेज़ खान के बाद मंगोलों ने अपने दहशत शुदा इलाक़ों पे अपना अपना सम्राज्य भी कायम किया,  और फिर केवल लूट नहीँ, बल्की अपने सम्राज्य की स्थापना भी शुरू कर दी।

चगेज़ ख़ान के बाद उस के पुत्रों और पौत्रों तक पहुंचते पहुंचते,  साल 1227  तक मंगोल सम्राज्य विश्व का सब से बड़ा सम्राज्य बन चुका था। यह रूस और चीन से ले कर  अरब सागर तक, यानी इराक़, मध्य एशिया, सीरिया, अफगानिस्तान, कश्मीर, और उधर पूर्वी यूरोप, यानि तुर्की , हंगरी, तथा पोलैंड तक फैल चुका था।

चंगेज़ की मृत्यु के बाद मंगोल सम्राज्य चार हिस्सों में विभजित हुआ, और यहां से शुरू हुआ चार अलग मंगोल वंशों का इतिहास।

चीन पर युआन मंगोल वंश का वह राज्यवँश स्थापित हुआ, जिस वंश में आगे चंगेज़ के पौत्र कुबला ख़ान का नाम मशहूर हुआ।

  रूस पे सुनहरे मंगोलों का, यानि चंगेज़ के ही पौत्र बाटू, या भाँतु ख़ान का सम्राज्य कायम हुआ।

मध्य एशिया और उज़्बेकिस्तान के इलाकों पर चुगताई वंश, यानि चुगताई ख़ान का राज्य स्थापित हुआ और पूर्वी यूरोप और अन्य यूरेशिआई इलाक़ों पर ह्लागु/हल्लागु या हलाकू ख़ान का राज्य स्थापित हुआ।
ह्लागु खान ही को, भारत में, हलाकू के नाम से जाना गया, जिस ने भारत पर कई हमले किये।

जलालुदीन ख़िलजी को हलाकू ने शर्मनाक हार दिखाई लेकिन उस के बाद अल्लाउदीन ख़िलजी ने हलाकू की और चुग़ताई मंगोल सेनाओं को एक बार नहीं, बल्कि बारमबार, छह बार नाकों चने चबवाये, हालां की खिल्जियों और मंगोलों की जंग में अलाउदीन का महान कप्तान, जनरल जफ़र ख़ान शहीद भी हुआ।

कुल मिला कर कहें तो सन् 1200  से ले कर चौदवीं  सदी के अंत तक यूरेशिया पर मंगोलों का बर्चस्व कायम रहा।

मंगोल विश्व के सब से बड़े सामूहिक कातिलों में से एक रहे हैं।  चगेज़ ख़ान के फारस के हमले के दौरान उर्घेच में 10 लाख, माँर्व में सात लाख, निशापुर में दस लाख सत्तर हज़ार, रे नामक शहर में पांच लाख लोगों को कत्ल कर दिया गया। 

हलाकू ख़ान के अपने इतिहास कारों के अनुसार उस ने दो लाख से ज्यादा आम शहरियों का कत्ल किया, और इस ख़ान नेँ अकेले ही इस्लामी सभ्यता को जड़ से उखाड़ डाला।  इतिहासकारों की माने  तो जो भी मंगोलों की तलवार के सामने आया, कत्ल कर दिया गया।

उधर सुनहरे मंगोल वँश के ख़ान, बट्टू ख़ान ने 1238 से 1240 तक रूस में ऐसी तबाही मचाई की रूसी सभ्यता कम से कम 300 साल पिछड़ गई। उस ने कीव और रीज़ान जैसे शहरों के सभी नागरिकोँ को मार डाला, और तक़रीबन अपने 200 साल के राज्य मैं रूस की किसानी और हस्तशिल्प उद्योग को बर्बाद कर के रूस कोे काले युग में धकेल दिया।

इधर ह्लागु ख़ान या हलाकू ने और चुगताई मुग़ल  वँश के दुवा खान ने भारत पर कई बार हल्ला बोला। जलालुदीन ख़िलजी को हलाकू नेँ शर्मनाक हार दी, उस की औरतों और खज़ाने को लूटा, लेकिन उपरांत अल्लाउदीन ख़िलजी से हलाकू की फौजें और चुगताई मुग़लों की फौजें, हर बार मार खा कर ही लौटीं।

कुल मिला कर अल्लाउदीन ख़िलजी के चलते मंगोल भारत पे अपना सम्राज्य नहीं स्थापित कर सके, लेकिन बाद में बाबर ने लोधी शाशकों द्वार शाषित दिल्ली पे कब्ज़ा कर लिया, और इस तरहं भारत में, मुग़ल वँश की नीव डली, जो  मंगोलों के वंशज ही थे।
मंगोल अपने समय के सुपर पॉवर थे, भारत पर उन्हों ने कई आक्रमण किये, जो सुल्तान अल्लाउदीन ख़िलजी ने विफ़ल कर डाले।

निश्चित ही यह सभी इतिहासकार मानते हैं की मंगोल अपने समय के सब से विधवंसक आक्रमणकर्ता थे  जिन्हें मौत और विनाश की भारी भरकम मशीन कहना गलत न होगा।

हिन्दोस्तान की लाखों साल पुरानी सभ्यता को मंगोलों के कहर से बचाने का काम  ख़िलजी ने किया, जिस ने मंगोलों को हर बार एक ज़बरदस्त टक्कर दी और जंग के मैदान में नाकों चने चबवाये।

अल्लाउदीन ख़िलजी अपने समय का एक अत्यंत बेहतरीन फ़ौजी कमांडर था, जिस ने एक अत्ती उत्तम किस्म की प्रिशिक्षित व अनुशाषित फ़ौज की व्यवस्था और सञ्चालन किया। फ़ौजी इतिहासकारों की नज़र में मंगोल अतयन्त ह्रदय विहीन लुटेरे थे जब की ख़िलजी एक अव्व्ल दर्जे का योद्धा व् सेनापती।
🚩तत्त सत्त श्री अकाल🚩
✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔⚔

Alauddin Khilji @ ✒Guru Balwant Gurunay⚔

Alauddin Khilji is all over the news, social network discussion,  mudslinging sites  and intellectual discussions, in wake of a controversy fulcrumed around  Bollywood film, 'Padmavati'. 

The film revolves around Khilji's conquest of Chittor in 1303, woven around his supposed obsession with Rani Padmini of Chittor,  based upon a poem of questionable authenticity.
Most of the people involved, in mudslinging of Khilji and politically motivated protests, have neither seen the film nor have they got any substantial knowledge of history.

What ever the truth, but Khilji is back from his grave, once again raising a storm of debates around him. A new found interest in this harshly ruthless king, but a genius of a military strategist and an extremely courageous general has once again brought him alive, and let me verily say, that just like Caeser'ghost haunted Rome, Khilji's ghost too is haunting the Indian subcontinent.

Let me bring to the notice of my friends and others who may be interested, the truth of Alauddin Khilji, one of world's sharpest and extremely courageous military geniuses.

Sultan Jalaluddin Khilji, Alaaudin's uncle, ruled over India before being killed by Alaaudin, in a coup and a sultanate takeover. The reason of Jalaluddin Khilji, being murdered by Allaudin Khilji, in the first place were the Mongols. Jalaluldin had averted war with the Mongols in a previous attack by agreeing to humiliating demands from them. This infuriated Alluding Khilji, as a result of which, he killed his uncle, the emperor of Delhi, and tookover the empire,  determined to fight the Mongols to the end. Alaaudin ruled Hindostan from from 1296  to 1316. Also it is worth pointing out here that  Khilji was not a foreign invader born in Afghanistan, as claimed by some, but an Indian  born in Delhi in 1266 AD

The most important contribution of Khilji towards India is his having defeated the mighty Mongols. Khilji fought back, not one or two, but six Mongol attacks on India, which if not  stalled, would have resulted in an absolute annihilation of Indian culture, economy and religion.

Mongols repeatedly invaded India in Khilji's time, and Khilji managed to defeat the Mongols not once, but each and every time.

What is special about Khilji having defeated Mongols?

Well, we must not forget that  Mongols were the most ruthless warriors of their times, who would totally annihilate a country they attacked, leaving not even a trace of the civilization in their targeted areas,  taking with them, any thing and everything of value, including able bodied men, beautiful young women, horses, precious stones and precious metals, weapons, utensils and even cattle, cats and dogs that they fancied. Rest every thing they killed or set ablaze, ensuring that no one could even seek revenge for a century, atleast.

That is why, the Mongols were referred to as  'Scourge of God' and feared as much as plague by people and kings alike.

Had the Mongols not been stopped by Alauddin Khilji,  all knowledge and culture, that had  accumulated here over centuries would have been destroyed.

As an example When Halaagu Khan,  conquered  Baghdad in 1258, he destroyed all libraries, schools, places of worship, agricultural lands, granaries, palaces and even home and hearth of commoners of the empire. 
The rivers Euphrates and Tigris turned black with ink and blood. Halaagu Khan Mongol single-handedly ended the Golden Age of Islam by his conquest of Abbasian Empire . The Mongol invasion of Russia  is another example, as it set Russia back by 200 years in its development.

Khilji defeated the Mongols, for the first time, his army led by  his brother Ulagh Khan and one of his best captains, General Jaffar Khan in1298,  inflicting up on Mongols a toll of 20,000 casualties.

In 1299, a Mongol invasion of India, was again defeated by Khilji's forces in Sindh, led again  by his trusted captain, General Zaffar Khan. 


In 1303, 1305 and 1306, Khilji himself  lead the army along with his trusted generals against the Mongols, and defeated them, this being an unprecedented military feat in those days,  the Mongols being an unstoppable force.

As already mentioned, no one in the rest of the world, including the Russians and mighty Persians or even Baghdad Caliphate  could stand against the dreaded Mongols.


All well read military historians know that  Khilji's armies were some of the most disciplined and well-trained armies of the then world, and Khilji him self was an unprecedented military genius.
🚩ਤੱਤ ਸੱਤ ਸ਼੍ਰੀ ਅਕਾਲ🚩
✒Guru Balwant Gurunay⚔

'क्या आज़ाद भारत, सिर्फ एक जुमला है' @ ✒गुरु बलवन्त गुरुने⚔

'आज़ाद भारत, सिर्फ एक जुमला' @ गुरु बलवन्त गुरुने⚔

© क्या आज़ाद भारत, सिर्फ एक जुमला है।  यह जुमला क्यों है ?  आइये इस का इतिहास देखें।

हम सब इस गलत फ़हमी में हैं की 1947 में भारत आज़ाद हुआ। जी नहीं, यह सत्य नहीं है।

 भारत आज़ाद नहीं हुआ लेकिन वह एक सत्ता परिवर्तन के दौर से गुजरा। बस यही सत्य है। 

मैं पुन्ह कहता हूँ के भारत एक सत्ता परिवर्तन के दौर से तो अवश्य गुजरा, लेकिन व्यवस्था जस की तस ही रही, और आज भी कायम है ।  इस में नया कुछ भी नहीँ था क्यों की सत्ता परिवर्तन तो भारत में सदियों से होता आ रहा है।

इसे ज़रा क्रमबद्ध देखें।

 भारत के लम्बे इतिहास पे यदी हम नज़र डालें, और इतिहास को राजाओं या आक्रमणकारियों के नाम और तिथियों से अलग कर के देखें, तो हम पाएं गे की यह लम्बी कहानी समझना कोई मुश्किल काम नहीं।

भारत शुरू में, यानि सदियों पहले, छोटे छोटे ग्राम राज्यों का उपनिवेश था। फिर यह छोटे छोटे  गांव, वक्त के चलते,  गाँव-समूहों में,  यानी  जनपदों में बदल गये। इन जनपदों पर जन नायकों का राज था, यानि हर जनपदधिकारी अपनी काबलियत के बल पर ही जनपद संचालन का काम करता था।

फिर जनपदधिकारी सत्ता लोलुप हो गए, तथा परिवारवाद से ग्रसित हो गए। राज्य वर्ग और पुरोहित वर्ग की मिलभगत से  यही जनपद  छोटे छोटे राज्योँ में बदल गए, यानी सत्ता अब राजाओं रजवाड़ों के हाथों  में चली गयी।

इस काम को सफलता पूर्वक करने के लिये राजाओं का सम्बन्ध भगवान से तथा सूर्य और चन्द्रमाँ तक से  जोड़ दिया गया। चन्द्र वंशी, सूर्यवंशी जैसे नाम गढे गए,  और राज्यवर्ग को एक खास भगवतीय और मिथ्याभासी महिमाम्ण्डल में स्थापित कर दिया गया।
अब भारतीय उपनिवेश छोटे छोटे सम्रद्ध, अस्मृध, सुप्रबन्धित या कुप्रबन्धित राज्यों के  हजूम में बदल गया।

फ़िर दौर शुरू हुआ सिंधु पार से आने वाले हमलावरों का।

आगे की कहानी में है भारत पर फारसियों और तुर्कों द्वारा हमला होंना,  सत्ता का फारसियों और तुर्कों के हाथों में चले जाना, उस के बाद मुग़लों का हमला, (बाबर का लोधियों पर हल्ला) और उपरांत उस के भारत का मुगलों के हाथ चले जाना।

ज़रा ठन्डे दिमाग से सोचें, काहे के सूर्यवंशी और काहे के चन्द्रवंशी, यदि यह सत्य होता तो भारतीय  राजाओं महाराजाओं ने अकबर जहांगीर इत्यादि को अपने वंश की कन्याएं कभी न ब्याही होती। ऐसा होने पर सूर्य और चन्द्र भगवान कुपित होते, लेकिन इस के विपरीत इस राह पे चलने वाले रजवाड़ों को सुल्तानों का संरक्षण मिला, वह फले फूले, और उन के कथाकथित वंशदेव, सूर्य और चन्द्रमा, दोनों ही ख़फ़ा नहीं हुए।

फिर वक्त के चलते मुग़लों के हाथों  से सत्ता अंग्रेजों के हाथ में चली गयी।  अंग्रेजों ने मुग़लों के बाद उपनिवेश को सुनियोजित तो किआ, लेकिन साथ ही  अंग्रेजों ने भारत को दबा कर लूटा। इस लूट को व्यवस्थित करने के लिए 17000 किलोमीटर लम्बे सड़क मार्ग बनाये  गए और 48000 किलोमीटर लम्बी रेललाइनें बिछाई गयी।

इस के इलावा भारतीय शाशकों से एक विधिवत तरीके से उन के राज्य हथिया लिए, जिस में साम, दाम, दण्ड, भेद, सभी का प्रयोग किया गया। यहां तक की ऐसे कानून बनाये, जिस के चलते किसी भी राज्य के बाँझ होने पर उस राज्य को गोरे अपने सम्राज्य में मिला लेते, या फिर bad governance के बहाने डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स (Doctrine of Lapse)   के नाम पर, किसी भी राज्य को गोरे अपने कब्ज़े में ले लेते।

इस कुचक्र से वही रजवाड़े बचे, जिन्होंने  अंग्रेजों की तन मन धन से सेवा की, और उन की ग़ुलामी स्वीकार की।  गोरों को खुश करने के लिये उन्हें हीरे मोती, शराब कबाब और उन की कदम-बोसी ही नहीं की, बल्कि अपनी स्त्रियां तक भी उन्हें पेश कर दी। पंजाब, राजस्थान और मध्य भारत के कई रजवाड़े इस कुचक्र में शामिल रहे।

उदहारण के तौर पे अंग्रेज़ की जूता-बोसि करते हुए ऐसा बदचलन चरित्र भी पेश हुआ, जब अमृतसर के जलिआंवाला बाग़ काण्ड में अनेकों भारतियों के निर्मम हत्याकाण्ड के बाद, हत्यारे जनरल डायर की मेहमाननवाज़ी अमृतसर के ही एक सरदार परिवार ने की।  उस परिवार ने डायर के सन्मान में प्रीतिभोज दे कर बेशर्मी और गद्दारी की एक नई मिसाल कायम की। अब और इस से बड़ी सरदार के किरदार की गिरावट भला क्या हो सकती है ? ऐसे सरदार को देश का गद्दार नहीं तो और भला क्या कहें गे, लेकिन भृष्ट व्यवस्था के चलते उस ही परिवार के कुछ लोग स्वतन्त्र भारत में मंत्री तक बने।

चलिये, बात को पुन्ह क्रमब्धत्ता पे लाते हैं। अँगरेज़ के शाशन के दौरान ही द्वित्य विश्वयुद्ध छिड़ गया, जिस के उपरांत, और जिस के कारण, अंग्रेजों की आर्थिक कमर टूट गयी, और उन्हें यह एहसास हुआ कि अब भारत जैसे उपनिवेश में  वह ज्यादा न टिक पाएं गे।
इस के चलते भगत सिंह जैसे क्रांतीकारियों को फांसी पे लटकाया गया, और उपरांत क्रन्तिकारियों की क़ुरबानी सदक़ा, अँगरेज़ ने भारत छोड़ने का मन बना ही लिया।

लेकिन याद रहे की सभी क्रांतिकारियों का वध किया गया, और त्रासदी यह की सत्ता एक अंग्रेज़, ए.ओ. ह्यूम्ज़ द्वारा स्थापित, और भूरे अंग्रजों द्वारा संचालित, कांग्रेस पार्टी के हाथों चली गयी।

अब एक नई पॉलिटिकल कलास का जन्म हुआ, यानी के खद्दर धारी, सादगी का नाटक करने वाले लेकिन महंगी जीवनशैली जीने वाले राजनेताओं की भृष्ट, दोगली और चरित्रहीन कलास। अय्याशी और मनमर्ज़ी का एक नवदौर शुरू हुआ, और साथ ही शुरू हुई भारतीय नेताओं में किसी भी कीमत पर सत्ता पाने की, और सत्ता में बने रहने की एक अन्धी दौड़।
इस अन्धी दौड़  के चलते, बहुत पैंतरेबाज़ी हुई, जिस के चलते एक कवि-ह्रदय लेकिन शातिर-दिमाग राजनेता ने इलाहाबाद  में गाय का मुद्दा राजनितिक मुद्दा बना दिया। फ़िर गाय का मुद्दा दहका कर सत्ता, संघियों की राजनितिक शाखा, जिसे आज लोग भाजपा के नाम से जानते हैं, के हाथों चली गयी।

सत्ता फिर कुछ बरसों बाद कांग्रेस के हाथ आई। इस दौरान कांग्रेसियों ने  खालिस्तान का मुद्दा दहकाया, जिस के चलते सिक्खों को पहले आतंकवादीयों के रंग में रंग दिया गया, खालिस्तान का निशान बुलंद किया गया, और फिर हरिमंदिर पे हल्ला बोला गया। फ़िर हुआ इंदिरा गांधी का कत्ल, और उपरांत दिल्ली दंगे।
नतीजा यह हुआ कि एक पायलट, जिस ने कभी नायब तहस्लदारी भी नहीं की थी, भारत का शाशक बन गया।

अब कांग्रेस फ़िर से सत्ता पे काबिज़ थी।
इस के तोड़ के तौर पर पुन्ह,  विपक्ष के एक शातिर रहनुमां ने मन्दिर और  मस्जिद का मुद्दा दहका दिया, और उस के बाद जो हुआ, वह आज भी हो रहा है, आप से कुछ छिपा नहीं।

यानी कुल मिला कर भारतीय इतिहास के इस लम्बे दौर में, तुर्कों से ले कर आज तक, रजवाड़ों, नेताओं और उन के कुत्ते झाडूबरदार सरदारों या चमचों का गन्दा खेल जारी है।

यह खेल है,   सत्ता पे काबिज़  लोगों की लगातार  झाड़ूबरदारी करते रहना, यानी  देश की परवाह किये बिना सत्ता की जूतियाँ चाटते रहना, और सत्ता की छोटी मोटी हड्डियों को चूस कर दिल बहलाते रहना।  इस सब के चलते भृष्ट साशकों द्वारा लोगों का सोशन बढ़ता ही चला जा रहा है।

एक तरफ झारखण्ड में चावल के दाने न मिलने पर लोग भूखे मर रहे हैं, तो दूसरी तरफ दुनिया के सब से महंगे वाहन, जूते और कपड़े भारत ही में सब से ज्यादा बिक रहे हैं,  यानी गरीब आमिर का फर्क लगातार बढ़ रहा है।

कानून व्यवस्था अत्ती विलम्बित, धीमी और भृष्ट होती जा रही है।  इस सब को सत्ता परिवर्तन तो  कहा जा सकता है, लेकिन व्यवस्था परिवर्तन, कदाचित नहीं कहा जा सकता।

  दरअसल भारतियों के ग़ुलाम बनने की हक़ीक़त, 1947 से पहले  एक कमीनी राजवाड़ाशाही, और उन के अत्यंत तुच्छ और नीच नौकरों की कहानी है, जिन्हें गलती से कुछ लोग सरदार  भी कहते हैं, (सरदार से यहां अभिप्राय सिक्ख धर्म के अनुयाइयों से नहीं,  बल्कि रजवाड़ों, अंग्रेजों या फ़िर आधुनिक भृष्टाचारी शाशकों के उन चाटुकार चमचों से है, जो रजवाड़ों और अंग्रेजों, दोनों ही के झाड़ूबरदार रहें हैं)।
तथा कथित आज़ादी के बाद  भारत की कहानी,  चरित्रहीन नेताओं और उन के नीच कुत्तों  द्वारा आमजन के शोषण की कहानी है, जो नकली आज़ादी के बाद भी विभिन्न राजनितिक पार्टियों पर किसी न किसी तरहं काबिज़ है, और सत्ता के शाही टुकड़े बटोरने में व्यस्थ हैं।

दरअसल इन राजाओं, नेताओं और और इन के सरदारों के सर और दस्तारें, दोनों ही,  पहले फारसियों, तुर्कों और मुग़लों के कदमों पे, और बाद में अंग्रेजों के कदमों पे पड़ी रहीं थी।

अब इन की दस्तारें और सर गाहेबगाहे बने, मौका-परस्त लीडरों और बड़े व्यपारिक घरानों के कदमों पे पड़ी रहती हैं। इन्होंने आज़ादी से पहले देश को गोरों को और  आज़ादी के बाद देश  बड़े  व्यपारियों को बेच दिया है।

इतना ही नहीं, इस सब के चलते भारत में एक ऐसी भृष्ट  और नकली लोकतान्त्रिक व्यवस्था का जन्म हुआ, जिस का बोझ आज तक हम उठा रहें हैं।
इतनी ही है,  बीते कल के भारत, और आज के भारत की व्यथा।

तो नतीजा यह निकलता है कि हमें, सत्ता परिवर्तन नहीं व्यवस्था परिवर्तन करना होगा, और वह व्यवस्था परिवर्तन केवल मात्र करंसी के नोटों का रंग बदलने से सम्भव नहीं।

इस के लिए राजशाही के सारे निशानों को मिटाना हो गा और एक सच्चे जनतन्त्र को स्थापित करना हो गा, जिस में न तो कोई पप्पू सिर्फ एक परिवार का पुत्र होने के कारण भारत का प्रधान मंत्री बनने के सपने देख सके, और न ही कोई फेंकू झूठ और जुमलों का सहारा ले कर इस महान देश का शाषक बन सके।

देश को केवल नारों और वादों की भोंडी राजनितिक बहस से आगे बढ़ के, गलियों में उतरना हो गा, और सदियों से चली आ रही भृष्ट व्यवस्था का अंत करना हो गा।

📚तत्त सत्त श्री अकाल🚩
✒गुरु बलवंत गुरुने ⚔

On Reading and Understanding History, a Short Take... by 🕯GBG📚

© History is loaded with useless  books  written by, paid, prejudiced and sometimes crazy people.

Thus history unless most critically studied can never be a reliable and objective account of the past, as subjective judgement and opinion are by default embedded in it.

My effort as a teacher and a student, has always  been to make stuff as concise and precise as possible, for ease of understanding, so what do I suggest in terms of understanding history.

I suggest, the first thing you do is to  get hold of a book called,  'The Hedgehog and the Fox: An Essay on Tolstoy's View of History', by Isaiah Berlin.

Berlin has explained in this book Leo Tolstoy's approach to history, which I fully endorse. He explains that Tolstoy was driven by a  desire to penetrate up to the original causes, to be able to understand how and why, things happened as they did,  and not otherwise.

 If we are to learn from the past, the account of it,  has to be true, or our understanding of it, won't be true aswell. IF this approach is not followed,  you might be preparing for a wrong battle, a battle of which, the map that you have, may not be representing  reality.

Most of the people do not understand that having a map.of a terrain is different than reality, and thus a recce of the terrain is a must.

Similarly any history book is only a map of a terrain, as it was in past, and has certainly changed as on today, as have the circumstances that triggered the historical events.

So a study of all possible maps, and all possible direct or indirect information,  and a recce of historical terrain via minds of great scholars, as to how they precieve truth to be, is  of paramount importance to study of history, and even then, one may wisely chose to remain sceptical.

 People with some reading of vague historical accounts, and some hearsay knowledge, will only enter the  terrain of truth, to find deserts where the mountains have been reported to be.

This “problem of historical truth” is explored by Isaiah Berlin in The Hedgehog and the Fox: An Essay on Tolstoy's View of History. He explains Tolstoy's  “desire to penetrate to first causes, to understand how and why things happen as they do and not otherwise.”

Thus not only in terms of history, but in all enquiries human, we must follow the Tolstoyian method of approaching the truth.

As per Tolstoy, “ History is Nothing but a collection of fables and useless trifles. History does not reveal causes; it presents only a blank succession of unexplained events.

Thus study of any historical event  is a waste of time, other than for trivia games or pub quizzes,  if you do not understand as to why it happened in the first place.
📚तत्त सत्त श्री अकाल🚩
✒Guru Balwant Gurunay⚔

Of Hedgehogs, Foxes and Leaders. @ © ✒ Guru Balwant Gurunay⚔

©  There are two types of people who operate in the power circles of a society.

The headstrong Hedgehogs, whose world view and other paradigms revolve around a fixed ideology, a fixed path  and the ever sniffing, ever alert foxes, thinking about all the different possibilities.

I would like to bring in our PM, Modi ji as an example here. He is a headstrong leader who is a 100%  hedgehog, when the hedgehog and the fox paradigm is applied to him.

Modi ji must see my logic, understand the paradigm, continue to be a hedgehog, but then, also at the same time, surround him self with as many foxes as possible.

But, he also must remember that 'Foxes' are of two types.

The first type are the rubber stamp follower foxes, who approve of every thing a hedgehog does, and thus validate a headstrong 'Hedgehog Leader', making him feel good about every thing he does, thus bringing him to a very certain doom. Such foxes must never be allowed in the inner circle, as they are greedy, opportuniSTS  and ambition driven, and  thus selfish. They are good as party workers but worthless as advisors.

The second kind of Foxes are the ones, who are bold and honest with their ever renewing benchmarks and opinions.

They challange the hedhehog in to following a persistent but more brainstormed and prudent path.

 These are the true advisors, the intellectuals, who must be hand picked from across board, from beyond the party pool, and from across different ideologies. These foxes need to be brought in to the inner circles as they ensure that a hedgehog wont go blatantly wrong in his directions and thus survive longterm.

I have used Modi ji as a metaphor here, although the paradigm is as applicable to Rahul ji, Arvind ji and all others across board.

To understand the essence of what I have said, any leader willing and wishing to be seated on throne for a sustained period of time, per se needs to understand this model.

The challange for any hedgehog is to recognise his own headstrong nature, recognise the two types of foxes, and then garner as many foxes as possible  of the first type to build numbers, yet only depend upon the second type of foxes for all essential advice.
 📚तत्त सत्त श्री अकाल🚩
✒ Guru Balwant Gurunay⚔

😎Politics of Hate and Future of India🤔 @ 📚GBG⚔

© The greatest threat to a 'United India' today  is strangely emerging, not from some enemy states,  but political charlatans and adventurers from, within India.

These, to be directly addressing the issue are our criminalised politicians.

India has already been damaged beyond repair by caste politics. It was expected that post 2014, the leaders will hit at the root of this cause, but alas, they have only been adding fuel of extreme religious politics to the fire, only to turn it in to an inferno.

 These dirty politicians of all hues and shades, indulging in politics of  pitting regions, religions, languages, rivers and caste  against each other, will only succeed in creating  a fractured India, even if they succeed in getting a marginally favourable mandate in their favour.

Let me assure you that, if at all these politicians of opportunity and divisive policies garner a few extra votes,  with their dirty ways, they shall only  get these votes at the cost of a fractured 'INDIANNESS'.

Many people , who have visualised a new nation , namely 'Akhand Bharat' to come up as a result of a positive political alliance betwen countries like Pak, BD, Nepal, SL, Burma joining the big picture as part of a huge federation or an 'Open Umbrella Confederation', the possibility of which could be a reality, as a result of political, defence and economic compulsions emerging in South Asia, post the Sino-USA tussle, may well feel cheated.

With this now almost established  narrative, of breaking temples, mosques, churches and gurudwaras etc, and pitting one community members against another, to the extent of killing members of another community, region, caste or religion, over differences of food and other cultural issues is bound to be extremly destructive.

With this, In the end all that the people of this vast nation may get are, some religious, regional or lingual states like Tamil land, Khalistan, Communist tribal land,  Rajputana, Jatland, Yadav land, a hard core communist Nepal,  and ofcourse Andhraland, Telangaland, and many other XYZ lands  etc etc.

These traders of 'Divide and Rule' are only destroying the dream of a (U.S.I) The United States of India.

This politics of division is the most unfortunate part of modern subcontinent taking place under cover of bogus calls for  'Pseudo-Nationalism' and 'Virtually Projected Development'.

Temples, Gurudwaras, Mosques or 'NO' Temples, Gurudwaras, Mosques, India and Indian-ness is paramount to a modern India, and that is being threatened by these political carpet sellers.

Let me boldly proclaim that 'Politics of Hate' is more dangerous than any external enemy to the 'Future of India',
🕯तत्त सत्त श्री अकाल🚩
✒Guru Balwant Gurunay⚔